गूगल के AI ने सुलझाई 50 साल पुरानी प्रोटीन की समस्या

गूगल के AI ने सुलझाई 50 साल पुरानी प्रोटीन की समस्या

गूगल के AI ने सुलझाई 50 साल पुरानी प्रोटीन की समस्या, जानिए क्या थी वो

मानव जीनोम (Human Genome) की प्रोटीन संरचनाओं की गूगल (Google) के द्वारा खोज आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस (AI) का जीवन विज्ञान में अब तक सबसे बड़ा योगदान साबित हो सकता है.

बदलाव हमेशा से ही इंसान के विकास का हिस्सा रहे हैं. मानव के शरीर में सूक्ष्म पदार्थों और जीन्स की भूमिका विशेष स्थान रखती है. चिकित्सा के क्षेत्र में भी हमारे वैज्ञानिकों को जीन्स के बदलावों पर खास निगाह रखनी पड़ रही है. इसमें जीनोम संरचना को समझने से बहुत सारी मानव के शरीर संबंधी समस्याओं का समाधान हासिल किया जा सकता है. मानव जीनोम में से केवल एक तिहाई के बारे में ही पूरी जानकारी मिल सकी है. लेकिन गूगल (Google) के नए आर्टिफीशियल इंटेलिजेस (AI) ने सभी मानव प्रोटीन की संरचनाओं (Protein Structure) का पता लगा लिया है.

जीनोम में प्रोटीन की अमीनो एसिड से बनी थ्री डी संरचना की समस्या ने दशकों से हमारे वैज्ञानिकों को परेशान कर रखा था. गूगल के जीप माइंड के द्वारा विकसित का गया एल्फाफोल्ड नाम के एआई ने जीनोम निर्देशों के डेटाबेस को जमा किया है और इतना ही नहीं उसे शोधकर्ताओं के लिए लिए इंटरनेट पर ऑनलाइन मुफ्त भी उपलब्ध करा दिया है.

प्रोटीन की अहमियत

प्रोटीन वे जटिल संरचना होते हैं जो हमारे शरीर की क्रियाओं में प्रमुख भूमिका निभाते हैं. और उन्हें कोशिका संरचना के मूल निर्माणकारी खंड की तरह माना जाता है. यूएस नेशनल लैबोरेटरी मेडिसिन के अनुसार प्रोटीन ही कोशिकाओं के बहुत सारे कार्य करते हैं और शरीर के ऊतकों और अंगों की संरचना, क्रिया और नियमन के लिए भी जरूरी होते हैं.

क्या होते हैं प्रोटीन

प्रोटीन छोटी सी संरचनाओं से बने होते हैं जिन्हें अमीनो एसिड कहा जाता है. ये एक दूसरे से शृंखला की तरह जुड़े होते हैं और अमीनो एसिड का अनुक्रम उनकी त्रिआयामीय संरचना का निर्धारण करता है. ये प्रोटीन कोशिकाओं को संचरना और सहायता प्रदान करता है. बड़े पैमाने की बात की जाए तो उनकी वजह से शरीर को चलने फिरने में मदद मिलती है वे विभिन्न कोशिकाओं, ऊतकों और अंगों के बीच होने वाले जैविक प्रक्रियाओं के समन्वय और संकतों के परिवहन का काम करते हैं.

50 दशक से पहले से प्रयास

दुनिया में सबसे पहले प्रोटीन की संरचना का निर्धारण साल 1958 को हुआ था. उसके बाद से वे शरीर की बहुत सी क्रियाओं, विशेषताओं औक प्रणालियों को समझने में मददगार हुए हैं. इन जटिल संरचानों को समझने के प्रायस में उपयोग में लाए जा रहे विभिन्न प्रयोगात्मक पद्धतियों पर काम तो चल ही रहा था, लेकिन इसके साथ ही प्रोटीन की संरचनाओं की कम्प्यूटेशनल पद्धतियां भी तेजी से विकसित की जा रही थीं. शोधकर्ताओं का कहना है कि इस उपलब्धि में जीवन विज्ञान में क्रांतिकारी बदलाव लाने की क्षमता है जिससे इस साल के अंतर 13 करोड़ प्रोटीन संरचनाओं के विकास की उम्मीद है.

यह होगा फायदा

शोधकर्ताओं का कहना है कि प्रोटीन का आकार के बारे में जानकारी से उनकी क्रियाओं को प्रणालियों के बारे में जानकारी मिलेगी. जिनके बारे में अब तक पता नहीं चल सका था और यह जीवविज्ञान के क्षेत्र में आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस का सबसे बड़ा योगदान हो सकता है. प्रोटीन संरचनाओं के उपलब्ध होने से कोशिकों को मूलभूत अंग को समझने में गति आएगी और इससे बीमारियों के इलाज के लिए नई दवाओं की उन्नत खोजों में भी मदद मिलेगी.

यहां भी उपयोगी होगी खोज

डीपमाइंड का कहना है कि इसके लावा एंटीबयोटिक प्रतिरोध, माइक्रो प्लास्टिक प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन जैसी समस्याओं का भी समाधान खोजने में मदद मिल सकती है. एआई टीम का कहना है कि आने वाले सालों में वे दस करोड़ संरचनाओं का पता लगा सकेंगे. अभी इस सिस्टम ने 95 प्रतिशत की सटीकता से लगभग सभी मानव प्रोटीन की संचरना का पता लगा लिया है.

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